ज्या वळणावरती भेट आपुली, तिथे तुझा मी निरोप घ्यावा.. तू मला पाहता मागे वळूनी..सुसह्य होई सख्या दुरावा..!
Tuesday, July 5, 2011
कलम
लिख न पाये तो वह कलम भी फिजूल लगती है.. कोरे कागज पर उतरे गझल तो सही कहलाए.. लब्ज उठाए तो शायरी भी बना सकते है...... हम तलाशते है..हमे बस एक कलम मिल जाए..!!!!
1 comment:
Anonymous
said...
दुवा करता हू कि आपकी कलम ऐसेहि हि रंग लाती रहे, और एक दिन शायारो कि मैफिल मे आपका नाम रोशन हो जाये..
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दुवा करता हू कि आपकी कलम ऐसेहि हि रंग लाती रहे,
और एक दिन शायारो कि मैफिल मे आपका नाम रोशन हो जाये..
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